राजगामी संपत्ति से आप क्या समझते हैं|राजगामी संपत्ति क्या है|

राजगामी संपत्ति से आप क्या समझते हैं किस तारीख से नई संहिता की धारा 59 के अधीन किसी ग्राम पंचायत या स्थानीय प्राधिकरण में तथाकथित भूमि निहित हुई

राजगामी संपत्ति का अर्थ :- उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2016 की धारा 115 के अनुसार जो तारीख 11-02-2016 से प्रभावी है (1) जहां किसी भूमिधर या ग्राम पंचायत से प्राप्त भूमि को धारित करने वाले किसी असामी की ज्ञात उत्तराधिकारी के बिना मृत्यु हो जाए वहां उपजिलाधिकारी ऐसे भूमिधर या आसामी द्वारा ध्रत भूमि का कब्जा लेगा और उसे विहित रीति से किसी एक समय में एक कृषि वर्ष की अवधि के लिए पट्टे पर दे सकता है|

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक पट्टे की निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जैसी विहित की जाएं|

(3) यदि भूमि पर परगना अधिकारी द्वारा कब्जा लेने के 3 वर्ष के भीतर कोई दावेदार भूमि को उसे वापस दिलाने के लिए आवेदन करें तो परगना अधिकारी ऐसी जांच करने के पश्चात जिसे वह उचित समझे ऐसे दावेदार को स्वीकार किया शिकार कर सकता है

(4) उपधारा (3) के अधीन अपना दावा अस्वीकृत होने के आदेश से क्षुब्ध कोई व्यक्ति उसे ऐसा आदेश संसूचित किया जाने के दिनांक के 1 वर्ष के भीतर अपने अधिकारों की घोषणा के लिए धारा 144 के अधीन वाद प्रस्तुत कर सकता है

(5) उप-जिलाधिकारी उपधारा (1) और (2) के अनुसार भूमि को पट्टे पर तब तक देता रहेगा जब तक की उपधारा (4) में निर्दिष्ट वाद का अंतिम रूप से विनिश्चय ना हो जाए

किस तारीख से नई संहिता की धारा 59 के अधीन किसी ग्राम पंचायत या स्थानीय प्राधिकरण में तथाकथित भूमि निहित समझी जाएगी ?

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2016 की धारा 115 (6) का कहना है कि यदि उपजिलाधिकारी द्वारा भूमि का कब्जा लेने के दिनांक से 3 वर्ष के भीतर कोई दावेदार उपस्थित ना हो या यदि ऐसे दावेदार का जिसका दावा उपधारा (3) के अधीन अस्वीकार कर दिया गया हो उपधारा (4) के अनुसार वाद प्रस्तुत न करें या यदि ऐसा वाद प्रस्तुत करें और वह अंतिम रूप से खारिज हो तो निम्नलिखित दिनांक से धारा 59 के अधीन किसी ग्राम पंचायत या स्थानीय प्राधिकरण में ऐसी भूमि निहित हुई समझी जाएगी अर्थात-

(क) उपधारा (3) में निर्दिष्ट 3 वर्ष की अवधि के समापन के दिनांक से जहां कोई दावेदार उपस्थित ना हो, या

(ख) उपधारा (4) में निर्दिष्ट 1 वर्ष की अवधि के समापन के दिनांक से जहां कोई दावेदार घोषणा का वाद दाखिल नहीं करता है, या

(ग) ऐसे अंतिम खारिज के दिनांक से जाओ उपधारा (4) के अधीन दावेदार दाखिल किया गया वादा अंततः खारिज कर दिया गया है|

 धारा 115 (7) का कहना है कि जहां कोई दावेदार उपधारा (3) के अधीन किसी दावे में या उपधारा (4) के अधीन किसी वाद में सफल होता है वहां वह तत्समय प्रदत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी ऐसी भूमि का अध्यासन और उसके संबंध में देय भू-राजस्व की समस्त बकाया उसके प्रबंध व्यय काटने के पश्चात पट्टेदार से वसूल की गई लगान पाने का हकदार होगा|

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