अपराध का अर्थ परिभाषा तथा आवश्यक तत्व
अपराध का अर्थ परिभाषा तथा आवश्यक तत्व
अपराध की अवस्थाएं कौन-कौन से हैं विवेचना कीजिए|(What are the various stages of crime)
अपराध की परिभाषा दीजिए अपराध किए जाने की कौन सी अवस्थाएं होती है| (Define offence. What are the different stages in the commission of crime? What is essential to constitute attempt?)
अपराध के विभिन्न परिभाषाओं की समीक्षा कीजिए तथा अपराध के आवश्यक तत्वों को स्पष्ट कीजिए|(Discuss the various definition of crime and explain the various elements of crime)
अपराध के कौन-कौन से तत्व है भारतीय विधि के अनुसार इनमें से कौन कौन से दंडनीय है|(What are different elements of crime? Which of these are punishable under Indian Law?)
अपराध की परिभाषा (Definition of offence) :- भारतीय दंड संहिता की धारा 40 अपराध को स्पष्ट रूप में परिभाषित नहीं करती सामान्य अर्थ में अपराध प्रत्येक ऐसा कार्य (Act) या कार्यलोप (Ommission) है जिसके करने पर या न करने पर समाज को आघात पहुंचता हो और उस समय लागू विधि द्वारा दंडनीय हो अत: अपराध के लिए निम्नलिखित दो तत्वों का होना आवश्यक है-
(i) ऐसा कार्य या भूल जो समाज को आघात पहुंचाता हो तथा
(ii) वह आघात किसी प्रचलित विधि द्वारा दंडनीय हो
अपराध की परिभाषा पूर्ण नहीं की जा सकती है इस संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत जानना आवश्यक है
1. ऑस्टिन के अनुसार - " अपराध वे वैधानिक कार्य हैं जिनके सिद्ध होने पर न्यायालय अपराधी को दंड देता है तथा जिनको केवल राज्य ही अपेक्षाकृत कम दंडनीय घोषित कर सकता है
2. मिलर के अनुसार - " अपराध वह कार्य कार्य है जिसे राज्य अपने नाम से चलाई गई किसी प्रक्रिया द्वारा दंड की चेतावनी के साथ करने से रोकता है या आदेशित करता है
3. पैटन के अनुसार - " अपराधों में राज्य का हस्तक्षेप अपेक्षाकृत अधिक होता है यह हस्तक्षेप न्यायिक कार्यवाही और न्यायिक निर्णयों दोनों में होता है
अपराध के आवश्यक तत्व (Essential of crime) :- अपराध के गठन के लिए निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है-
1. यह कि अपराध करने में कम से कम एक व्यक्ति विद्यमान था
2. यह कि अपराधी में अपराध करने की क्षमता थी
3. यह कि अपराध दुराशय से प्रेरित होकर किया गया था
4. यह कि अपराध किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु किया गया था
5. यह कि अपराध में दुराशय किसी कार्य द्वारा बाह्य रूप से प्रकट था
6. यह कि अपराध समाज के लिए क्षतिकारक था और
7. यह कि वह कार्य किसी लागू विधि के अंतर्गत दंडनीय था
भारतीय विधि के अंतर्गत अपराध (Crime under Indian Law) :- यद्यपि आंग्ल विधि में अपराध के पूर्ण होने के लिए उक्त तत्वों का होना आवश्यक है किंतु भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध उक्त तत्वों का होना आवश्यक नहीं है क्योंकि भारतीय दंड संहिता में प्रत्येक अपराध के आवश्यक तत्व उस अपराध की परिभाषा में ही निहित कर दिए गए हैं जैसे; जानते हुए, साशय, बेईमानी से, कपट पूर्ण ढंग से आदि अमुक कार्य भूल आदि किसी अपराध विशेष की परिभाषा के अनुकूल होता है तो उसे अपराध की संज्ञा दे दी जाती है अन्यथा नहीं इसलिए भारतीय दंड संहिता में कहीं भी अपराध के आवश्यक तत्व का अलग से वर्णन नहीं किया गया है तथा अपराधी विचार जैसी अवधारणा का भी यहां कोई स्थान नहीं है
फिर भी सामान्य रूप से हम कह सकते हैं कि किसी अपराध के लिए निम्नलिखित शर्तों का होना आवश्यक है
1. किसी कार्य का किया जाना या न किया जाना :- अपराध का सर्वप्रथम आवश्यक तत्व किसे कार्य का किया जाना या किसी कार्य करना करना है यह कार्य से तात्पर्य से का रस है जो कानून द्वारा वर्जित है जैसे यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी सीमा विशेष में अवरुद्ध करता है तो वह सदोष पर विरोध का दोषी माना जाएगा क्योंकि कानून किसी भी व्यक्ति को स्वेच्छा पूर्वक ऐसा करने से मना करता है इसी प्रकार किसी ऐसे कार्य को न करना भी अपराध है जिसे करने के लिए वह कानूनन बाध्य है| अतः दोनों प्रकार के कार्य अर्थात सकारात्मक नकारात्मक कार्य अपराध की श्रेणी में आते हैं|
2. अपराधी का सक्षम होना :- सक्षम होने से तात्पर्य कानूनी क्षमता से है एक व्यक्ति शारीरिक या भौतिक रूप से किसी कार्य को करने के लिए सक्षम हो सकता है किंतु वह व्यक्ति कानूनी रूप से सक्षम नहीं माना जा सकता| उदाहरणार्थ -7 वर्ष से कम आयु का शिशु किसी व्यक्ति को हानि कर सकता है परंतु धारा 82 के अंतर्गत उसके कार्य को अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि वह अपराध करने में सक्षम नहीं है|
3. अपराधिक कार्य का जानबूझकर या स्वेच्छा से किया जाना :- जानकारी अथवा स्वेच्छा भी अपराध के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है बशर्ते कि ऐसा सिद्ध किया जाना उस अपराध के लिए आवश्यक हो|
4. अपराधिक कार्य का ध्येय, आशय या दुराशय से प्रेरित होकर किया जाना :- किसी कार्य को अपराध ठहराने के लिए ध्येय, आशय और दुराशय का महत्वपूर्ण स्थान होता है|यह तीनों ही अपराध के मानसिक तत्व माने जाते हैं| साधारण शब्दों में ध्येय का अर्थ है-लक्ष्य या उद्देश्य|लगभग सभी कार्य के पीछे कोई ना कोई ध्ये़य या लक्ष्य छिपा रहता है अतः जब कोई कार्य किसी उद्देश्य से प्रेरित होकर किया जाता है तो वह अपराध की श्रेणी में आ जाता है किंतु ध्येय नैतिक, अनैतिक वैधानिक एवं अवैधानिक कैसा भी हो सकता है अतः ध्ये़य मात्र से ही किसी कार्य काे अपराधी मान लिया जाता है यदि दिखाइए को प्राप्त करने के साधन गैरकानूनी हैं तो वह ध्येय अपराध की सीमा में आएगा अन्यथा नहीं|
आशय ध्येय का अगला कदम है ध्येय को कार्य रूप में परिणत करना ही आशय माना जाता है जहां दुश्मनी का बदला लेना ध्येय है वहां मृत्यु करना आशय माना जाता है अतः ध्येय अपराध का पहला तत्व है और आशय उसके बाद का|परंतु कोई कार्य तभी अपराध माना जाता है जब वह दुराशय से प्रेरित होकर किया जाता है| उदाहरणार्थ झाड़ी के पीछे किसी आदमी को जानवर समझकर शिकारी उस पर गोली चलाता है और उसकी मृत्यु कर देता है यहां शिकारी आपराधिक दायित्व से मुक्त रखा जाएगा क्योंकि उसके मन में कोई दुराशय नहीं था परंतु भारतीय विधि में प्रत्येक ऐसे कार्य को अपराध माना जाता है जो विधि विरुद्ध भले ही वे दुराशय से किया गया है या नहीं|
अपराध की अवस्थाएं (Stages of crime) :- प्रत्येक अपराध को करने की निम्नलिखित चार अवस्थाएं होती है-
(1) अपराध करने का आशय (Intention to Commit Crime)
(2) अपराध करने की तैयारी (Preparation to Commit Crime)
(3) अपराध करने का प्रयास (Attempt to Commit Crime)
(4) अपराध की पूर्णता (Completion of Offence)
1. अपराध करने का आशय (Intention to Commit Crime) :- कोई कार्य तभी दंडनीय होता है जबकि वह दुराशय से प्रेरित होकर किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाए और साथ ही ऐसा से किसी बाह्य कार्य द्वारा स्पष्ट होने तक केवल आशय दंडनीय न होगा लॉर्ड कैनिंग मैं इस बात को एक बड़े ही अच्छे उदाहरण से स्पष्ट किया है एक व्यक्ति क्लब स्टैंड से छाता चुराने के आशय से छाता उठाता है किंतु जब उसे घर आकर देखता है तो वह जाता उसका अपना ही निकलता है ऐसी अवस्था में उस व्यक्ति पर अपराधिक जाए तो नहीं डाला जा सकता हालांकि इसका इरादा छाता चुराने का ही था कारण यह है कि वह चोरी करने के बाह्य कार्य की श्रेणी में नहीं आता अत: आशय जब तक कार्य रूप में परिणित नहीं होता दंडनीय नहीं होता लोर्ड मेन्सफील्ड के अनुसार जब तक किसी कार्य का आशय ही होता है तब तक वह कानून द्वारा दंडनीय नहीं है परंतु जैसे ही कोई कार्य किया जाता है तब कानून किए गए कार्य का निर्णय ही नहीं करता बल्कि उस आशय को भी देखता है जिससे वह किया गया है तथा यदि वह अवैध था या द्वेषपूर्ण आशय से किया गया होता है तो वह कार्य अपराधिक और दण्डनीय होगा|
2. अपराध करने की तैयारी (Preparation to Commit Crime) :- तैयारी में अपराध को करने के लिए साधन जुटाए जाते हैं तैयार की अवस्था में किए हुए कार्य को संहिता में दंडनीय नहीं माना गया है तैयारी की अवस्था में जब मनुष्य आपराधिक कार्य करने की अवस्था मैं उस बिंदु पर पहुंचता है जब कार्य किया जाता है तो हो सकता है कि उसे पश्चाताप होने लगे और वह अपराध करने का विचार त्याग दें विधि में पश्चाताप के अवसर को मान्यता दी गई है अतः विधि में तब तक यही माना जाएगा कि किसी व्यक्ति ने अपराधिक कार्य का प्रयत्न किया जब तक की तैयारी की अवस्था पर ना कर गया हो उदाहरणार्थ 'अ' किसी व्यक्ति की हत्या करने की बात सोचता है वह पिस्तौल खरीदता है जहां हत्या करनी है वहां जाने के लिए रेलवे टिकट खरीदना है यह सब करने के लिए क्योंकि उसने तैयार की अवस्था पार नहीं की है अतः उसे अपराधी नहीं माना जाएगा अतः सामान्यतया किसी अपराध की तैयारी मात्र दंडनीय नहीं है किंतु निम्नलिखित मामलों में की गई तैयारी भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडनीय है-
(i) भारतीय सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से हथियार आदि इकट्ठा करना (धारा 122)
(ii) भारतीय सरकार के साथ मैत्री संबंध रखने वाले शक्ति के राज्य में लूटमार करना (धारा 126)
(iii) डकैती डालने की तैयारी करना (धारा 399)
3. अपराध करने का प्रयत्न (Attempt to Commit Crime) :- किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे कार्य को जानबूझकर करना प्रयत्न कहलाता है जिसको पूर्ण करने में वह अपनी इच्छा से स्वतंत्र होने वाले परिस्थितियों के कारण असफल रहता है स्टीफन के अनुसार किसी अपराध को करने के लिए प्रयत्न का तात्पर्य उस दुराशय के आधार पर किए गए कार्य से है जो कार्यों की श्रंखला से संबंधित है और यदि हस्तक्षेप न किया गया होता तो वास्तविक अपराध गठित हो जाता|
उदाहरणार्थ अ सफल के ढेर में आग लगाने के इरादे से खलिहान में रखी फसल के ढेर के पास बैठ जाता है एक सिगरेट निकालता है और उसे जलाता है और माचिस को बुझा देता है प्रस्तुत मामले माचिस जलाने का प्रत्यक्ष दृश्य कार्य तैयारी को प्रयास में बदल देता है अ ने सफल के ढेर में आग लगाने के प्रयास का अपराध किया निम्नलिखित मामलों में अपराध करने का प्रयत्न मात्र भी अपराध है-
(i) हत्या करने का प्रयास (धारा 307)
(ii) अपराधिक मानव वध करने का प्रयत्न (धारा 308)
(iii) आत्महत्या करने का प्रयत्न (धारा 309)
(iv) लूट करने का प्रयत्न (धारा 393)
इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 511 प्यार करने के प्रयत्न को एक दंडनीय अपराध घोषित करती है इस धारा का कहना है कि जो कोई-
(i) ऐसा अपराध करता है जिसके लिए संहिता में आजीवन कारावास या कारावास के दंड दिए जाने का प्रावधान है, अथवा
(ii) ऐसे अपराध को किए जाने का आधार बनाता है या
(iii) ऐसे प्रयत्न में अपराध के लिए किए जाने से संबंधित कोई कार्य करता है वह अपराध करने की कोशिश का अपराधी माना जाएगा
धारा 511 का विस्तार (Scope of Sec 511) :- उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि धारा 511 निम्नलिखित दशको में लागू नहीं होती
1. ऐसे अपराध जो भारतीय दंड संहिता द्वारा अपराध घोषित ना हो
2. ऐसे अपराध जो मृत्युदंड या केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
3. ऐसे अपराध जिनके प्रयासों के लिए संहिता में पृथक प्रावधान हो
4. ऐसे अपराध जो पूर्ण हो चुके हैं
उदाहरणार्थ-क ख की जेब में हाथ डालकर जेब से धन चुराने का प्रयास करता है किंतु जेब खाली होने के कारण उसे कुछ नहीं मिलता यहां पर का धारा 511 के अधीन चोरी करने के प्रयास का दोषी है
चेष्ठा के गठन के लिए क्या आवश्यक है ? (What is Essential to Constitute Attempt ?) :- दंड विधि का सामान्य सिद्धांत यह है कि जब तक अपराधों से तथा तैयारी की स्थिति में रहता है तब तक इसे अपराध नहीं माना जाता अपराध पूर्ण तभी होता है जब आपसे तथा तैयारी के साथ अपराध करने का वास्तविक प्रयास किया जाता है अतः विधि वेत्ताओं का मत है कि किसी अपराध को पूर्ण करने के लिए आशय तैयारी तथा प्रयास तीनों का संयुक्त रूप से विद्यमान होना अनिवार्य है अतः कोई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य करने के प्रयास का अपराध उस समय करता है जब वह उस अपराध विशेष को करने के लिए वहां से समझौता है और तैयारी पूरी करके उस अपराध विशेष को करने के आशय से उसे करने की दिशा में कदम उठाता है|

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