IPC-दुराशय का सिद्धांत (Mens Rea)

 IPC-दुराशय का सिद्धांत (Mens Rea)|

दुराशय आपराधिक उत्तरदायित्व में एक आवश्यक तत्व है समझाइए|("Mens rea" is an essential element in criminal liability)                  Or


'अपराधी भाव का सिद्धांत' से आप क्या समझते हैं क्या इस सिद्धांत का कोई अपवाद है विवेचनात्मक समीक्षा करें|(What do you understand by 'Doctrine of Mens rea' ? Is there any exception to this doctrine ? Examine critically.)

IPC-दुराशय का सिद्धांत (Mens Rea)|आवश्यक तत्व
IPC-दुराशय का सिद्धांत (Mens Rea)|आवश्यक तत्व



किसी व्यक्ति के अपराधिक दायित्व के संबंध में अंग्रेजी सामान्य विधि का मूलभूत सिद्धांत यह है कि कोई भी कार्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता जब तक कि वह अपराधी भाव से ना किया जाए इस सिद्धांत का आधार सूत्र 'Actus non facit reum nisi mens sit rea' है| इस सूत्र का अर्थ यह है कि केवल कार्य दंडनीय नहीं है तथा केवल अपराधी विचार दंडनीय नहीं है बल्कि कार्य और दुराशय दोनों मिलकर दंडनीय अपराध की रचना करते हैं ('act' and 'intent' both constitute the guilt)| अतः यदि किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराना है तो यह दिखाना आवश्यक है कि (i) उसने अमुक कार्य (ii) दुराशय के साथ किया था| अतः दोषसिद्धि के लिए निम्नलिखित दो तत्वों का होना आवश्यक है-

1. दोषपूर्ण कार्य (Wrongful Act) :- जस्टिन ब्रायन ने कार्य की ओर संकेत करते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति के विचारों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि मनुष्य के मन की बात को शैतान भी नहीं जान सकता फतेह कानून व्यक्ति के विचारों में क्या है इस पर दृष्टि नहीं डालता बल्कि उसने जो कुछ किया है उस पर नजर रखता है लॉर्ड कैनी ने इस बात को एक अच्छे उदाहरण से स्पष्ट किया है एक व्यक्ति कल्ब के स्टैंड से छाता चुराने के विचार से छाता उठाता है लेकिन यह छाता उसी का निकलता है ऐसी स्थिति में उस पर आपराधिक दायित्व नहीं लादा जा सकता हालांकि उसकी इच्छा छाता चुराने की ही थी इसका कारण यह है कि यह केवल चोरी करने हेतु एक अपराधी विचार ही था जो कार्य रूप में परिणित न हो सकने के कारण बाह्य कार्य की श्रेणी में नहीं आता उसने चोरी का अपराध नहीं किया|


2. दुराशय (Mens Rea) :- अपराधिक दायित्व के निर्धारण के लिए दूसरा आवश्यक तत्व है दुराशय|कोई कार्य न कि विचारों उस समय तक अपराध नहीं माना जाता जब तक कि वह कर्त्ता द्वारा आशय से प्रेरित होकर न किया गया हो दूसरे शब्दों में किसी कार्य को करते समय यदि कर्त्ता का विचार तथा आशय शुद्ध है तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकता |उदाहरणार्थ- यदि अ शिकार है तो जंगल में जाकर किसी जानवर को मारने के भुलावे में यदि किसी व्यक्ति को जान से मार देता है तो ऐसी स्थिति में वह हत्या का दोषी ना होगा क्योंकि मारते समय उसका से किसी व्यक्ति की हत्या करने का न था बल्कि जानवर का शिकार करना था अतः अपराधी विचार के अभाव में अ किसी अपराध का दोषी नहीं है


              किंतु स्मरणीय है कि भारतीय दंड संहिता में दुराशय को अधिक महत्ता नहीं दी गई है इसमें विभिन्न धाराओं में जो विभिन्न परिभाषाएं दी गई हैं उनमें अपराधों को निश्चित करते हुए जैसे 'जानते हुए', 'साशय', 'बेईमानी से', 'कपट पूर्ण ढंग से' आदि शब्दों को शामिल किया गया है जिनसे स्वत: ही अपराध के लिए दुराशय की मनोवृत्ति के तत्व होने का ज्ञान होता है अतः स्पष्ट है कि निराशा से ही कोई कार्य अपराध बनता है अन्यथा नहीं


       दुराशय का उपनियम यह है कि जो व्यक्ति अपराध विचार रखने के अयोग्य है वह सदा ही अपराधिक दायित्व से मुक्त रहते हैं ऐसे व्यक्तियों की चर्चा दंड संहिता के 'सामान्य अपवाद' के अध्याय में विस्तृत रूप से की गई है|उदाहरणार्थ विकृत चित, नशा किए हुए व्यक्ति तथा 7 वर्ष से कम आयु की अवस्था वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य आपराधिक कार्य नहीं माना जाता क्योंकि इन अवस्थाओं में दिमाग में अपराध करने का दौरा से नहीं होता किसी प्रकार तथ्य की भूल दुर्घटना व्यक्तिगत सुरक्षा सामान्य कारण न्यायिक कार्य आदि के अंतर्गत किया गया कार्य अधूरा से पूर्ण न होने के कारण क्षमा योग्य होता है धारा 76 से धारा 176 के अंतर्गत किए गए कार्य इसी पर आधार पर अपवादित है


दुराशय के सिद्धांत के अपवाद(Exception to the doctrine of Mens Rea) :- निम्नलिखित मामलों में अपराधिक दायित्व के लिए दुराशय का सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है जहां-

1. अपराधी का कार्य लोक बाधा के अंतर्गत आता है

2. संविदा द्वारा पूर्ण या कठोर दायित्व निर्धारित किया गया हो कुछ मामलों में जनहित को ध्यान में रखते हुए अपराधी प्रमुख कार्य करने को करने या न करने का कानून पूर्ण दायित्व आरोपित होता है जैसे हथियार रखने मोटर चलाने आवश्यक वस्तुएं बेचने आदि के लिए लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक है यदि कोई व्यक्ति उक्त कार्य बिना लाइसेंस के ही करता है तो उसका कार्य गैरकानूनी होगा भले ही ऐसी अवहेलना के पीछे कोई दुराशय ना हो

3. दुराशय का सिद्ध किया जाना कठिन हो तथा अपराध के लिए निर्धारित दंड बहुत छोटी धनराशि हो

4. स्थानापन्न दायित्व का सिद्धांत लागू होता है

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             अतः स्पष्ट है कि उक्त वर्णित अपराधों को छोड़कर शेष सभी मामलों में अपराधी विचार के बिना किए गए कार्य के लिए किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता इस बात का प्रमाण हमें दंड संहिता में दिए गए सामान्य अपवाद के अध्याय से मिलता है इस अध्याय में यह भी घोषित किया गया है कि यदि कोई आपराधिक कार्य तथ्य की भूल दुर्घटना सहमति सामान्य कार्य और व्यक्तिगत सुरक्षा के संबंध में अपराधी विचार के बिना ही किया गया है तो ऐसा कर अपराध की श्रेणी में नहीं आता धारा 81 के अनुसार कोई बात केवल इस कारण अपराध नहीं है कि वह यह जानते हुए कि गई है कि उस से हानि होना संभव है यदि वह हानि करने के लिए किसी आपराधिक आस है के बिना और व्यक्ति या संपत्ति को अन्य हानि का निवारण या परिवर्तन करने के उद्देश्य से सदभावना पूर्वक की गई हो

स्पष्टीकरण- ऐसे मामले में यह तथ्य का प्रश्न है कि जिस आने का निवारण या परिवर्तन किया जाना है क्या वह ऐसी प्रकृति की और इतनी खतरनाक थी कि वह कार्य जिसे यह जानते हुए कि उस से हानि होना संभव है करने की जोखिम उठाना न्यायोचित या क्षमा योग्य था यदि हानि वास्तव में ऐसी खतरनाक प्रकृति की थी इसका दूर करना यह जानते हुए भी कि उसका कार्य से व्यक्ति विशेष की हानि होना संभव है तो ऐसा जोखिम उठाना भी नियोजित होगा

उदाहरणार्थ - (i) क एक बड़े अग्निकांड के समय आग को फैलने से रोकने के लिए मकान को गिरा देता है वह इस कार्य को मानव जीवन में संपत्ति को बचाने के एस एस एस सदभावना पूर्वक करता है यहां यदि यह पाया जाता है कि निवारण की जाने वाली हानि इस प्रकृति की और इतनी खतरनाक थी कि का का कार्य क्षमा योग्य है तो उस अपराध का दोषी नहीं है (sec 81)

(ii) यह को एक बार उठा ले जाता है यह जानते हो कि संभावना है की गोली लगने से या मर जाए किंतु या का वध करने का आशय ना रखते हुए और सदभावना पूर्वक ही अकेला ओके ऐसे से उस बात पर गोली चलाता है ताकि गोली यह को मृत्यु कारक घाव हो जाता है का ने कोई अपराध नहीं किया है (sec 92)

(iii) क एक शल्य चिकित्सक एक रोगी को सदभावनापूर्वक यह सूचित करता है कि उसकी राय में वह जीवित नहीं रह सकता इस आधार के फलस्वरुप उस रोगी की मृत्यु हो जाती है क ने कोई अपराध नहीं किया है यद्यपि वह जानता था कि उस सूचना से उस रोगी की मृत्यु होना संभव है (sec 93) 

निष्कर्ष :- संक्षेप में उक्त वर्णन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि न्यायालय किसी भी मामले में अपराधियों को उसके अपराधी विचार सिद्ध किए बिना दण्ड नहीं दे सकता जब तक कि अपराधी विचार की विधि द्वारा स्पष्ट रूप से अपराध की परिभाषा से अलग ही न कर दिया गया हो

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