मद्रास की न्याय व्यवस्था-ईस्ट इंडिया कंपनी-1639-1726 East India Company 1639-1726

 

ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित सूरत और मद्रास की प्रारंभिक न्यायिक व्यवस्था का वर्णन                                                                     या                                  मद्रास में मेयर कोर्ट की स्थापना से पूर्व प्रारंभिक न्याय प्रशासन पर संक्षिप्त निबंध                                                                                   या                                        ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मद्रास बस्ती में 1639 से 1726 तक लागू की गई न्याय प्रणाली का वर्णन                                                                 या                                      मद्रास नगर की स्थापना के इतिहास की संक्षेप में चर्चा करते हुए इस कथन को स्पष्ट कीजिए कि वहां के न्यायिक संस्थाओं का विकास तीन चरणों में हुआ                           

  *1726 से पूर्व सूरत में शासन और न्याय-व्यवस्था*      

(i) प्रशासनिक व्यवस्था:- सूरत की कोठी की शासन और न्याय प्रणाली बहुत ही प्रारंभिक तन की थी शासन का भार प्रेसिडेंट और उसकी परिषद में नियत होता था सभी महत्वपूर्ण विषयों का निर्णय काउंसिल के बहुमत से होता था प्रेसिडेंट को कोई विशेष अधिकार प्रदान न करके परेशान करने सदस्यों की भांति बैठकों में एक मत देने का अधिकार दिया गया था और वह बहुमत की अवहेलना नहीं कर सकता था|

(ii) विधि एवं न्याय व्यवस्था:- कानून एवं न्याय की दृष्टि से सूरत में रहने वाले अंग्रेज दोहरे कानूनों के अंतर्गत शासित थे उनके अपने आपसी विवाद अंग्रेजी कानून के आधार पर सुलझए जाते थे लेकिन उनके भारतीयों के साथ विवादों का निर्णय मुगल न्याय के सिद्धांतों के आधार पर किया जाता था|

(अ) अंग्रेजी न्याय पद्धति:- प्रेसिडेंट एवं उनकी परिषदों के कार्यो के संचालन के अतिरिक्त अंग्रेजी विधि के अनुसार अंग्रेजों के पारस्परिक दीवानी तथा आपराधिक विवादों के निर्णय के लिए न्यायालय के रूप में कार्य करते थे| प्राय: परिषद के सदस्य विधि के ज्ञान से रहित और अनुभवहीन होते थे जिसके निर्णय युक्तिसंगत और तार्किक न होकर निम्नस्तरीय होते थे| सिद्धांत रूप में तो अंग्रेजी विधि की दुहाई दी जाती थी, किंतु व्यवहार में इसे सुसंगत आधार ना बनाकर सुबह बैंक से विवादों का निपटारा किया जाता था|

(ब) भारतीय न्याय-पद्धति:-  सूरत में भारतीयों के पारस्परिक तथा अंग्रेजों और भारतीयों के विवादों का निपटारा स्थानीय न्यायालय के अंतर्गत मुगल न्यायिक प्राधिकारी द्वारा किया जाता था|इन न्यायालय की दशा अत्यंत दयनीय बनी हुई थी| यह भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी और पक्षपात से ग्रसित होने के कारण अन्याय का दमन करने में संलग्न थे| जिन मामलों का निपटारा स्वयं मुगल सम्राट द्वारा नहीं होता था|वे सामान्यतःसंतोषजनक होते थे| हेमिल्टन के अनुसार, "कानून मुसलमानों के हाथ में है और न्याय केवल उन्हें को बेचा जाता है जो अधिकतम मूल्य देते हैं विजय पक्ष से कुल राशि का 25% न्यायाधीश अपनी फीस के रूप में लेता है न्याय कभी भी निष्पक्ष नहीं होता है|"
           आपराधिक मामलों मे मुस्लिम विधि के अनुरूप दिए जाने वाले दंड बर्बर और अमानवीय होते थे|अंग्रेजों को ऐसी व्यवस्था से घृणा होना स्वभाविक था और इसी कारण वह बहुदा कानून को अपने हाथों में लेने के अवसर की तलाश में रहते थे| वास्तव में मुगल पदाधिकारियों और अंग्रेजी प्रशासकों को दोनों ही के न्याय प्रशासन के दुखद वातावरण से भारत में ब्रिटिश न्यायिक पद्धति के विकास की कहानी प्रारंभ होती है परंतु समय के साथ-साथ न्यायिक पद्धति में धीरे-धीरे सुधार होता गया|

सूरत में प्रचलित न्याय व्यवस्था के दोष:- इस व्यवस्था में निम्नलिखित दोष थे-
1. अंग्रेजों के आपसी विवादों का निपटारा करने के लिए स्थाई न्यायालय स्थापित में किए गए थे
2. फैक्ट्री का अध्यक्ष इंग्लैंड के कानून से अनभिज्ञ था तथा उसका न्यायिक अधिकारियों पर प्रत्यक्ष रूप से कोई अंकुश नहीं था
3. अंग्रेजों पर द्वारा कानून लागू होता था मुस्लिम कानून को स्वीकार करने के लिए वे तैयार नहीं थे
4. धार्मिक विचारों के वादों को निपटाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों पर उनके व्यक्तिगत कानून लागू होते थे
5. सूरत में अंग्रेज तथा भारतीय उच्च न्याय प्राप्त नहीं कर सकते थे क्योंकि मुगलों की न्याय व्यवस्था संतोषजनक नहीं थे यह व्यापक भ्रष्टाचार का शिकार थी|

     *मद्रास नगर की स्थापना का इतिहास*

वास्तव में मद्रास प्रेसि डेंसी नगर की न्यायिक व्यवस्था का विकास 1726 से पूर्व अगर लिखित तीन चरणों में हुआ-

1प्रथम चरण 1639 से 1665 तक (First Stage 1639 to 1665) :- आरंभिक अवस्था में मद्रास नगर को कंपनी के एक एजेंसी का दर्जा दिया गया| नगर के प्रशासन हेतु एक अंग्रेज एजेंट नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई जो अपनी काउंसिल की सहायता से मद्रास के व्यापार की देखभाल और न्याय प्रशासन का कार्य करता था एजेंट अपने कार्यों के लिए सूरत प्रशासन के अधीन रहता था| वह केवल अंग्रेजों के मुकदमे को तय किया करता था भारत के न्याय प्रशासन हेतु अलग न्यायालय होता था जिसे चोल्ट्री (Choultry Court) कोर्ट कहते थे| अतः प्रारंभिक अवस्था में मद्रास नगर की न्याय व्यवस्था का कार्य दो भिन्न न्यायालय द्वारा किया जाता था| जिनमें अलग-अलग न्याय व्यवस्था अपनाई जाती थी-    

(अ) व्हाइट टाउन में स्थापित एजेंट एंड काउंसिल का         न्यायालय :- इस न्यायालय का अध्यक्ष कंपनी द्वारा नियुक्त किया गया एक अंग्रेज एजेंट नामक अधिकारी होता था| वह अपनी काउंसिल के सदस्यों की सहायता से केवल श्वेत नगर के निवासी अर्थात अंग्रेजों के पारस्परिक झगड़ों का निपटारा किया करता था|किंतु न्यायालय का क्षेत्राधिकार सुनिश्चित ना होने के कारण उसे घोर अपराधों से संबंधित विवादों को निपटाने करने के लिए इंग्लैंड में कंपनी के पास भेजा जाता था|जिससे न्यायालय न्याय प्रशासन में अनावश्यक देरी होती थी| फलस्वरूप इस न्यायालय का महत्व दिन प्रतिदिन घटता गया|

(ब) ब्लैक टाउन में स्थापित चोल्ट्री न्यायालय :- चोल्ट्री न्यायालय का अध्यक्ष गांव का मुखिया है जिसे अदिगर कहते थे, होता था वह मद्रास पटनम के निवासियों अर्थात भारतीयों के बीच उत्पन्न होने वाले छोटे-छोटे फौजदारी एवं दीवानी वादों का निर्णय प्रचलित रीति-रिवाजों के आधार पर किया करता था| इसके अलावा उसका कारण यह भी था कि गांव की संपत्ति की बिक्री का लेखा-जोखा रखे तथा गुलामों के लाइसेंसों की रजिस्ट्री करें, किंतु कुछ समय के बाद अदिगर अपने कार्यभार में अयोग्य सिद्ध हुआ|भारत निवासी जो प्रथम अधिकार नियुक्त किया गया था को रिश्वत तथा भ्रष्टाचार के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया और उसके स्थान पर कंपनी में दो अंग्रेज अदिगरों कैप्टन मार्टिन एवं जॉन की नियुक्ति की जो सप्ताह में 1 दिन या प्रशासन का कार्य किया करते थे|

2. द्वितीय चरण 1665 से 1686 तक(Second Stage 1665 to 1686) :- मद्रास को एजेंसी के स्थान पर प्रेसिडेंसी का स्तर प्रदान किया गया सर स्ट्रेनशाम मास्टर 1678 में गवर्नर नियुक्त किया गया| उसने द्वितीय चरण में चोल्ट्री न्यायालय का पुनर्गठन किया तथा शीघ्र ही हाई कोर्ट आफ जुडीकेचर नामक न्यायालय की स्थापना की|

(अ) चोल्ट्री न्यायालय का पुनर्गठन :- चोल्ट्री न्यायालय का पुनर्गठन किया गया न्यायालय के न्यायिक पद पर दो के स्थान पर अब तीन अंग्रेज अदिगरों की नियुक्ति की गई इसका अध्यक्ष हमेशा एक अंग्रेज न्यायाधीश होता था न्यायालय अब सप्ताह में दो बार ने प्रशासन के लिए बैठता था इसे मामूली फौजदारी के मुकदमों तथा 50 पैगोडा तक के दीवानी मुकदमों का निर्णय करने का अधिकार था इस न्यायालय के फैसलों की अपीलें गवर्नर तथा उसके सलाहकार समिति को की जाती थी|अपील के नियमों को उच्च न्यायालय के नाम से ही पुकारा जाता था|

(ब) हाई कोर्ट आफ जुडीकेचर :- उक्त गवर्नर एवं उसकी काउंसिल का न्यायालय सुव्यवस्थित नहीं था सन 1678 में सर स्ट्रेनशाम मास्टर ने मद्रास के गवर्नर पद पर नियुक्त होने के बाद न्यायालय की दयनीय दशा को सुधारने का निश्चय किया| फलस्वरूप यह नियम बनाया गया कि गवर्नर एवं उसकी काउंसिल 12 जूरीगणों की सहायता से सप्ताह में दो बार सभी प्रकार के फौजदारी और दीवानी मुकदमों का निर्णय अंग्रेजी कानून के अनुसार किया करेगा इस न्यायालय को चोल्ट्री कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार भी दिया गया न्यायालय द्वारा दिए गए हत्या के अपराधों के फैसले के विरुद्ध अपील इंग्लैंड में की जाती थी उच्च न्यायालय का नाम जुडीकेचर उच्च न्यायालय रखा गया|

3. तृतीय चरण 1686 से 1726 तक(Third Stage 1686 to 1726) :- 1690 तक अंग्रेजी पुर्तगाली तथा तमिल भाषा न्यायालय में प्रचलित थी|यद्यपि शासकीय भाषा अंग्रेजी घोषित कर दी गई थी इस काल में न्याय प्रशासन को उपयोगी बनाने के लिए दो मुख्य न्यायालय की स्थापना की गई-

(अ) कोर्ट ऑफ एडमिरैलिटी :- सन 1683  की राजाज्ञा द्वारा कंपनी को यह अधिकार दिया गया था कि वह आवश्यकता के अनुसार एक ही अधिक न्यायालय को स्थापित कर सकती है फलस्वरुप समुद्र पर आने जाने वाले व्यापारिक जहाजों पर डकैती हत्या तथा अन्य अपराधों को रोकने के लिए एक नौसेना न्यायालय की स्थापना की गई न्यायालय के 3 सदस्य होते थे जो गवर्नर के काउंसिल के सदस्य भी होते थे|
इस न्यायालय ने कोर्ट आफ जुडीकेचर को समाप्त करके उसका क्षेत्राधिकार ले लिया|इस प्रकार है कि नौसेना के बजाय एक सामान्य न्यायालय ही बन गया तथा दीवानी वैवाहिक और व्यापारिक विवादों का परीक्षण करने लगा सन 1687 में प्रसिद्ध विधि बता सर जॉन विक नामक एक अंग्रेज को न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया|

(ब) मेयर कोर्ट :- सन 1687 की राजज्ञा के अंतर्गत एक मेयर कोर्ट नामक न्यायालय की स्थापना की गई इसमें एक मेयर 12 एल्डरमैन तथा 60 या उससे अधिक  बरज्ेस शामिल मेयर एक अंग्रेज होता था जिसका चुनाव प्रतिवर्ष एल्डरमैन करते थे जो जीवन भर अपने पद पर बने रहते थे इस न्यायालय को अपनी सीमाओं में उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के फौजदारी तरह दीवानी मुकदमे का फैसला करने का अधिकार था दीवानी मामलों में इस के निर्णय के खिलाफ अपील एडमिरैलिटी कोर्ट में की जाती थी तथा फौजदारी के वादों में अपराधियों को मृत्युदंड या अंग भंग की सजा दी जाती थी वहां उसके निर्णय के विरुद्ध अपील एडमिरैलिटी कोर्ट में ही की जाती थी|  न्यायालय को कानूनी सलाह देने के लिए एक विधि विशेषज्ञ की नियुक्ति का प्रावधान था जिसके अनुसार प्रथम लॉ रिकॉर्डर सर बिग्स किया गया|

निष्कर्ष :- इस प्रकार कुल मिलाकर अंतिम समय में मद्रास में तीन न्यायालय न्याय प्रशासन किया करते थे, (i) चोैल्ट्री कोर्ट (ii) एडमिरलिटी कोर्ट (iii) मेयर कोर्ट| वह व्यवस्था इस रूप में मद्रास में सन 1726 तक चालू रहेगा
मेयर कोर्ट की स्थापना का यह प्रभाव हुआ कि चोल्ट्री कोर्ट का महत्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया यह बहुत ही साधारण मामलों में थोड़े जुर्माने कोड़े लगाने तथा साधारण कारावास की सजा दे सकता था यह दीवानी मामलों में केवल 5 पैगोडा मूल्य के वादों का निर्णय ही कर सकता था|

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