मर्यादा विधि क्या है प्रकृति एवं उद्देश्य
मर्यादा विधि क्या है इसकी प्रकृति एवं उद्देश्य क्या है ? (What is law of Limitation ? What is its nature and object ?)
मर्यादा विधि का अर्थ :- मर्यादा विधि ऐसे समय की सीमा को निश्चित करती है इसके समाप्त होने के पश्चात कोई भी वाद या कार्यवाही न्यायालय के अंतर्गत नहीं लाई जा सकती अतः यह अधिनियम किसी भी व्यक्ति को समय की समाप्ति के पश्चात न्यायालय में वाद लाने से रोकता है और जैसा कि बुश्वैल ने कहा है, "मर्यादा अधिनियम एक ऐसी कालावधि को सुनिश्चित करता है जिस के समापन पर प्रतिवादी उत्तर देने से छुटकारा पा जाता है
मर्यादा अधिनियम वादी के अधिकारों को न तो सुनिश्चित ही करता है और न ही स्थगित ही वरन यह उस समयावधि का निर्धारण करता है जिसके अंतर्गत वादी वाद प्रस्तुत करता है यदि निश्चित कालावधी के अंतर्गत बाद पेश नहीं किया जाता तो प्रतिवादी को मुक्त समझा जाता है अतः मर्यादा विधि द्वारा निर्धारित अवधि के पश्चात आवाज पेश नहीं किया जा सकता साधारण शब्दों में में कहा जाए तो यह विधि वाद की अवधि के भीतर वाद को लाया जा सकता है एक बार यह अवधि समाप्त हो जाए तो उसके बाद वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता
अधिनियम की प्रकृति (Nature of Act) :- मर्यादा अधिनियम न तो अधिकार प्रदान करता है और न अधिकारों के होते हुए उनका हरण ही कर सकता वरन् यह तो मात्र न्यायिक उपाय को प्रतिबंधित करता है इससे मर्यादा अधिनियम के द्वारा अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं होता है साधारण शब्दों में इस नियम के अंतर्गत ना तो अधिकारों को प्रदान किया जाता है और ना ही उनके हनन होने पर उनकी रक्षा की जाती है यह तो मात्र न्यायिक उपाय को रोकता है जिससे मर्यादा अधिनियम के द्वारा अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं होता उदाहरणार्थ यदि क को 3 वर्ष के अंदर ख से किसी ऋण की वसूली करनी है तो क को चाहिए कि वह निश्चित अवधि के अंदर ही ख से उस ऋण की वसूली करें एक निश्चित अवधि के अंतर्गत का से ऋण वसूल नहीं किया गया है और न ऋण प्राप्ति के लिए न्यायालय के अंतर्गत वाद ही पेश किया गया है तो क अपने अधिकारों से वंचित हो जाएगा और ख ऋण मुक्त समझा जाएगा
मर्यादा अधिनियम पूर्ण विधि है इस अधिनियम का उल्लंघन आपसे समझौतों के द्वारा नहीं किया जा सकता है इस प्रकार ऐसा ही कोई समझौता है जो विधि द्वारा प्रदत्त मान्यताओं को घटाता हो या उनमें कोई भी वृद्धि करता हूं सोने समझा जाता है यह अधिनियम धारा 25 26 और 27 को छोड़कर एक प्रक्रियात्मक विधि है अर्थात एक ऐसी विधि है जो केवल उपाय एवं प्रक्रिया से संबंद्ध है
यह अधिनियम केवल वादी को ही प्रभावित करता है इससे प्रतिवादी का कोई संबंध नहीं है इसका प्रमुख कार्य समय अवधि के पश्चात वाद को पेश न करने से रोकना है इसके द्वारा सभी न्यायालयों द्वारा निर्दिष्ट तिथि के पश्चात पेश किए गए वादों को रोकना तर्कपूर्ण एवं न्याय संगत है यह अंतरराष्ट्रीय विधिशास्त्र का शाश्वत नियम है कि सभी वादों को विधि के अंतर्गत ही जो कि स्थानीय विधि द्वारा लागू होना चाहिए

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