दीवानी न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियां-Inherent Power of Civil Court

 दीवानी न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you understand by inherent powers of Civil Court ?)

दीवानी न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां (Inherent Powers of Civil Court) :- कोई भी कानून अपने आप में पूर्ण नहीं होता कानून के नियम सामान्य होते हैं अतः वे उन सभी सुविधाओं के खिलाफ जिनकी संख्या निश्चित होती है सब काल के लिए नियम नहीं बना सकते क्योंकि विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न मामले उत्पन्न होते रहते हैं कोई भी संहिता चाहे वह कितनी ही बुद्धिमानी से क्यों न बनाई गई हो फिर भी सभी घटनाओं के लिए और सभी समयों के लिए नियम नहीं बना सकता वह स्वाभाविक और सामान्य प्रसंगों का अनुमान करते हुए ही विधियों का निर्माण करता है कोई भी मनुष्य भविष्य की घटनाओं की कल्पना नहीं कर सकता इसलिए न्यायालय के सामने ऐसे मामलों के निपटारे के लिए न्यायालय को कुछ शक्तियां प्रदान की जाती हैं जिन्हें न्यायालय के अंतर्निहित शक्तियां कहा जाता है यह सत्य न्यायालय को साम्य न्याय एवं शुद्ध अंतःकरण के आधार पर वादों का अपहरण करने के लिए सशक्त करती हैं परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उन शक्तियों का प्रयोग न्यायालय तभी कर सकेगा जबकि संहिता में इसके संबंध में कोई व्यवस्था न की गई हो


दीवानी न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियां
दीवानी न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियां-Inherent Power of Civil Court

             
              न्यायालय के अंतर्निहित शक्तियों से हमारा तात्पर्य है ऐसी शक्तियों से है जो न्यायालय को ऐसे मामलों के निपटारे के लिए प्रदान की जाती हैं जिनके बारे में विधि में कोई उपबंध नहीं दिए गए हैं वहां न्यायालय साम्य न्याय एवं शुद्ध अंतःकरण के आधार पर बाद तय करते हैं न्यायालय अपने इन अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए न तो विधि के स्पष्ट उपबंधो को अधिभूत कर सकता है और न ही वह ऐसी कोई बात कर सकता है जो विधि द्वारा वर्जित हो अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग तभी किया जा सकता है जबकि संहिता के विशिष्ट उपबंध मामलों की आवश्यकता को पूरा नहीं करते हैं इस संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 में न्यायालय की निम्नलिखित अंतर्निहित शक्तियों की व्यवस्था की गई है

       इस संहिता की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे आदेशों के देने के लिए ले कि अंतर नहीं सकती को सीमित या अन्यथा प्रभावित करती है जो न्यायालय के उद्देश्य के लिए या न्यायालय के आदेशिका के दुरुपयोग के निवारण के लिए आवश्यक है

धारा 151 एक व्याव्रत्ती खंड है जो बहुत पुराने और उसको स्थापित नियम को मान्यता देती है कि प्रत्येक न्यायालय पक्षों के बीच वास्तविक और सारवान न्याय करने के लिए जिसके प्रशासन के लिए ही वह वर्तमान है अंतर्निहित शक्ति रखता है या पक्षों को कोई मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करती बल्कि उसका उद्देश्य उन कठिनाइयों को दूर करना है जो प्रक्रिया के नियमों से उत्पन्न होती है विभिन्न निर्णय के आधार पर सामान्यतया निम्नलिखित मामलों में न्यायालय को धारा 151 के अंतर्गत अंतर्निहित शक्तियां प्राप्त हैं

1. बाद में किसी पक्षकार को बढ़ाना या उसमें परिवर्तन करना

2. अपीलो और वादों को जिसमें उच्चतम न्यायालय को की जाने वाली अपीले भी शामिल है समेकित करना

3. निर्धन व्यक्ति के मामले में बचाव करने का अवसर प्रदान करना

4. किसी खास विवाद के निर्णय के दौरान जहां किसी दूसरे लंबित वाद में कुछ विवाद्यक (Issue) समान हो वादों की सुनवाई को स्थगित करना

5. सुविधा के आधार पर प्रतिदावा (Cross suit) को स्थगित करना

6. ऐसे किसी मामले को प्रतिप्रेषित (Remit) करना जिस पर आदेश 14 नियम 25 लागू नहीं होता

7. ऐसे मामलों में प्राण न्याय (Res-judicata) के सिद्धांत को लागू करना जो संहिता की धारा 11 के अंतर्गत नहीं आते

8. ऐसे प्रश्न का प्रश्न ज्ञान करना जो पक्षों के बीच विवाद ग्रस्त विषय वस्तु को ही समाप्त कर देता हो

9. न्यायालय के आगमन के लिए सरसरी तौर पर कारावास से दंडित करना 

10. ऐसे आदेश को निरस्त करना जो न्यायालय से कपट द्वारा प्राप्त किए गए हुए

11. न्यायालय द्वारा पारित किसी डिग्री के निष्पादन में उस समय हस्तक्षेप करना जबकि है उसके आशय एवं अभिप्राय के विपरीत रीति से की जा रही हो

12. सावधानीपूर्वक दी गई न्यायालय शुल्क की वापसी का आदेश देना

13. किसी बात को रोक देना चाहे वह संहिता की धारा 10 के अंतर्गत नहीं आता हो

14. न्यायालय के निर्देश की अवहेलना करते हुए किए गए किसी विक्रय को निरस्त करना

15. अपने द्वारा प्रदत्त अमान्य या अशुद्ध आदेशों को शुद्ध करना

दीवानी प्रक्रिया संहिता सर्वांगपूर्ण नहीं है और धारा 151 कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करती बल्कि चीजों को करने की जैसी न्याय की मांग होती है न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को कानूनी मान्यता देती है| जस्टिस वुडरोफ ने हुकमचंद बनाम कमलनंद सिंह 3 Cal 927 में धारा 151 की प्रयोज्यता के संबंध में यह कहा गया कि "मुझे कोई भी ऐसा प्रावधान मालूम नहीं है जिसमें यह कहा गया हो कि सिविल प्रक्रिया संहिता सर्वांगपूर्ण है इस संहिता का सार इसमें कोई संदेह नहीं के उन विषयों पर सर्वांगपूर्ण होता है जिनके बारे में यह कानून किसी ऐसे प्रश्न पर घोषणा करती है जो विषय रूप में इसके द्वारा बढ़ता जाता है ऐसे विषयों के संबंध में न्यायालय अधिनियम के वास्तविक अर्थ की अपेक्षा नहीं कर सकता और न ही उसकी शब्दावली के बाहर जा सकता संहिता वहां पर किसी न्यायालय की शक्ति और कर्तव्य को प्रभावित नहीं करती जहां न्याय, साम्य में शुद्ध अंतःकरण के अनुसार कार्य करने के लिए कोई विशेष प्रावधान वर्तमान नहीं है यद्यपि ऐसी शक्ति के प्रयोग में वह यह देखने के लिए सावधान होगा कि उसका निर्णय उचित साम्य के सिद्धांतों पर आधारित है और उन सिद्धांतों तथा विधानमंडल के आशयों से उसका विरोध नहीं है इसलिए न्यायालय ने बहुत से मामलों में जिसमें परिस्थितियां अपेक्षा करती हैं न्याय की मांग के अनुसार कार्य करने की और जिस न्याय के प्रशासन के लिए यह वर्तमान हैं वैसा वास्तविक एवं सारवान न्याय करने के लिए अंतर्निहित शक्ति की मान्यता पर कार्य किया है|

निष्कर्ष (Conclusion) :- संक्षेप में हम कह सकते हैं कि चूंकि दीवानी प्रक्रिया संहिता सर्वांगपूर्ण नहीं है इसलिए जहां ऐसे मामले उपस्थित हों जिन पर फैसला देने के लिए इस संहिता में व्यवस्था नहीं है वहां न्यायालय अपनी उपर्युक्त अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करेगी एक मामले में सरकार ने अंतिम आदेशों की आड़ में शक्कर व्यापारियों के अतिरिक्त लेवी का धन वसूल किया व्यापारियों ने उक्त कार्यवाही को चुनौती दी और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 126 के अधीन कार्यवाही के संदर्भ में उक्त आदेश गलत है इसलिए पिटिशनकर्त्ता न्यायालय से सरकार को उचित निर्देश दिलवाने के अधिकारी थे

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