परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 6-Sec 6 of Limitation Act 1963
अवधि उपचार की रुकावट है न कि अधिकार की|व्याख्या कीजिए|("Limitation bars the remedy not the right" Explain)
अवधि उपचार की रुकावट है न कि अधिकार की (Limitation bars the remedy not the right) :- गौरीशंकर बनाम शिव नारायण 46 A.U. A.I.R. 124 में यह निर्णय लिया गया कि मर्यादा अधिनियम द्वारा निर्धारित अवधि की समाप्ति केवल न्यायिक उपचार मात्र में ही रूकावट डालती है किंतु अधिकार को समाप्त नहीं करते यदि कोई व्यक्ति अपने किसी अधिकार को न्यायालय द्वारा लागू कराना चाहता है तो उसे यह दिखाना होगा कि उस अधिकार का प्रवर्तन मियाद अधिनियम द्वारा निर्धारित अवधि की सीमा में किया गया है अन्यथा न्यायालय उस अधिकार को लागू नहीं करेगा यदि न्यायालय उस अधिकार को मियाद अवधि की समाप्ति के कारण लागू नहीं करता तो उसका तात्पर्य है नहीं होता कि वह अधिकार समाप्त हो गया है बल्कि इसका केवल यह अर्थ है कि वह अधिकारी का पूर्ण अधिकार की श्रेणी में आता है जो केवल न्यायालय द्वारा तो लागू नहीं किया जा सकता किंतु अन्य किसी भी प्रकार से स्वयं वादी द्वारा न्यायालय की सहायता के बिना लागू किया जा सकता है
उदाहरणार्थ अ 1000 रुपये ब को उधार देता है ब उस रकम को 3 साल तक नहीं लौटाता है अ द्वारा अपना कर्ज वसूल करने के लिए वाद दायर किया जाता है न्यायालय इस वाद को इस आधार पर खारिज कर देता है कि वह अवधि बाधित है ऐसी अवस्था में अ न्यायालय की सहायता से रुपया वसूल नहीं कर सकता|किंतु यदि ब अपने द्वारा लिए गए कर्ज का भुगतान मुकदमा चलाने से पहले कर देता है और बाद में उसे पता चलता है कि उसे कानून रूपया अवधि बाधित होने के कारण वसूल नहीं किया जा सकता था तो ब को यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायालय में यह वाद दायर करें कि उसके द्वारा दी गई रकम अ से वापस दिलाई जाए ऐसी अवस्था में चूंकि अ के पूर्ण अधिकार का प्रवर्तन न्यायालय के बाहर हो चुका है इसलिए अब न्यायालय भी उसके अधिकार को मान्यता प्रदान करते हुए उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा और अ का ब द्वारा किया गया भुगतान मान्य होगा और अ से ब को धन वापस नहीं दिलाया जाएगा अतः यह कहना उचित है कि अवधि केवल न्यायिक उपचार को मना करती है किंतु अधिकार को नष्ट नहीं करती बशर्ते कि उस अधिकार को अन्य तरीकों से लागू करा लिया जाए
वैधानिक असमर्थता संबंधी विधि (Law relating to Legal Disability):- वैधानिक असमर्थता से संबंधित विधि धारा 6 में दी गई है मियाद अवधि अधिनियम 1963 यह सामान्य नियम प्रतिपादित कर दिया कि जब से वाद कारण पैदा हुआ है तभी से मर्यादा भी आरंभ हो जाती हैं किंतु धारा 6 में वर्णित वैज्ञानिक असमर्थता इस सामान्य नियम का एक अपवाद है यह विधि अयोग्यताएं किसी बात को पेश करने या आज्ञप्ति के निष्पादन करने के लिए प्रार्थना पत्र पेश करने हेतु निम्नलिखित आधारों पर मान्य हैं-
1. अव्यस्कता (Minority)
2. पागलपन (Insanity)
3. जड़ बुद्धित्ता (Idiocy)
उक्त आधारों पर धारा 6 के अधीन अयोग्यता का लाभ ऐसे व्यक्ति को प्राप्त होता है जो वाद पेश करने या व्यक्ति के निष्पादन के अधिकारी होते हैं न कि उन व्यक्तियों को जिनके खिलाफ वाद चलाए गए हैं अतः असमर्थता में मियाद अवधि गणना के समय अनवरत रूप से होनी चाहिए किंतु धारा 6 के अनुसार जो मर्यादा विधि के आरंभ होने के बाद कोई योग्यता होती है तो उसका कोई भी प्रभाव नहीं होता
1. अव्यस्कता (Minority) :- नाबालिग से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है किंतु जिस व्यक्ति या उसकी संपत्ति आप दोनों के लिए न्यायालय द्वारा संरक्षक नियुक्त किया गया है उसकी अयोग्यता 21 वर्ष के बाद खत्म होती है अतः किसी ऐसे मामले में जब वाद कारण उत्पन्न हुआ था तब यदि वादी नाबालिक था तुम यादव जी उसकी नाबालिग के दौरान लागू न होगी
उदाहरणार्थ :- अ किसी व्यक्ति को किसी कर्ज को वसूल करने का अधिकार उसकी नाबालिगी के दौरान उत्पन्न होता है और वाद कारण के उत्पन्न होने के 4 वर्ष बाद वह बालिग होता है तो वह बालिग होने के 3 वर्ष के अंदर कभी भी वाद दायर करने का हकदार है
2. पागलपन (Insanity) :- पागल या अस्वस्थ चित्त व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जो यह जाने में असमर्थ होता है कि वह जो कुछ कर रहा है वह उसके हित के अनुकूल है या प्रतिकूल अर्थात उसको अपने भले या बुरे को समझने की शक्ति नहीं होती ऐसे व्यक्ति के खिलाफ भीम यादव जी तब तक नहीं चलती है जब तक कि वह स्वस्थ चित्त नहीं हो जाता
3. जड़ बुद्धित्ता (Idiocy) :- ऐसा व्यक्ति जो अपने जन्म के समय से ही स्वस्थ चित्त होने के कारण किसी भी बात को समझने में असमर्थ होता है|
कार्यवाही पेश करने के लिए मियाद अवधि अनुसूची के तीसरे कॉलम द्वारा निर्धारित होगी किसी नाबालिक की अवधि की गणना करते समय बालिग होने की तारीख को छोड़ देना चाहिए किंतु जब कोई नाबालिग वाद दायर करता है तो उसे अध्यक्ष अक्षम व्यक्तियों के समान धारा 4 का ही लाभ मिलेगा

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