दण्ड क्या है दण्ड के प्रमुख सिद्धान्तों की चर्चा कीजिए
दण्ड क्या है दण्ड के प्रमुख सिद्धान्तों की चर्चा कीजिए|(What is punishment Discuss the main principles of punishment.) या
दण्ड को परिभाषित कीजिए दण्ड के विभिन्न उद्देश्यों का वर्णन कीजिए. (Define Punishment. What are the purposes of the Punishment.) या
सामंड के अनुसार आपराधिक न्याय के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं ? (What according to Salmond are the chief ends of Criminal Justice ?) या
दण्ड के विभिन्न सिद्धांत क्या है ? (What are the various theories of Punishment ?)
दंड के उद्देश्य क्या है (What are the purposes of Punishment) :- दंड क्यों दिया जाता है अर्थात दंड के क्या उद्देश्य हैं दंड के मुख्य रूप से निम्न निखिल निम्नलिखित पांच उद्देश्य हैं जिन्हें हम दंड के सिद्धांत भी कह सकते हैं अर्थात दंड की व्यवस्था भी विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न रूप में की है सामान्य के मतानुसार आपराधिक न्याय के विभिन्न उद्देश्यों को दृष्टि में रखते हुए दंड के चार सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं
1.निवारणार्थ सिद्धांत (Deterrent Theory) :- इस सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी को कठोरतम दंड देकर अन्य लोगों को भयभीत करके अपराधों को रोकना है| यह सिद्धांत वह के मनोविज्ञान पर आधारित है इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थक सोफिस्टूस बेंथम फिशर प्लेटो आदि हैं दंड इतना कठोर होना चाहिए जिससे भावी अपराधी उसको याद करके भयभीत हो उठे अपराध की गंभीरता को देखते हुए मृत्यु दंड देना न्यायोचित है बशर्ते कि उसका प्रभाव दूसरों के ऊपर व्यापक रूप से पड़ता हो प्राचीन तथा मध्य काल में भयोत्पादक दंड को अधिक महत्व दिया जाता था और अपराधियों को खुले स्थानों में फांसी कोड़े लगाना उबलते तेल या पानी में डालना दीवाल में जिंदा चुनवा देना आदि उनके कठोर दंड प्रचलित थे कठोर दंड का उद्देश्य न केवल अपराधी को दोबारा उस अपराध करने से रोकना है बल्कि उसको कठोरतम दंड देकर दूसरों को सबक देना होता है|
आलोचना (Criticism) :- वर्तमान युग में यह सिद्धांत बहुत ही अव्यवहारिक अमनोवैज्ञानिक अतार्किक तथा अवैज्ञानिक ठहरता है| यदि दंड वास्तव में भी उत्पादक होता तो अपराध बिल्कुल समाप्त हो जाते या उन में कमी आ जाती परंतु ऐसा नहीं हुआ उदाहरणार्थ महारानी एलिजाबेथ के समय में जेब काटने के लिए मृत्युदंड दिया जाता था फिर भी इस दृश्य को देखने के लिए एकत्रित हुए जन समुदाय में ही जेब काटने चोरिया छेड़छाड़ की अपराधिक वारदातें हो जाया करती थी अतः दंड का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था इस सिद्धांत का मुख्य दोष यह है कि इसमें अपराधी को कठोर दंड देकर उसे आत्म सुधार के अवसर से वंचित रखा जाता है और मानवीय दृष्टिकोण से अनुचित है आता यह सिद्धांत अपने आप में पूर्ण नहीं है और ना ही इसके आशयित परिणाम निकले हैं
2.निरोधात्मक सिद्धांत (Preventive Theory) :- निरोधात्मक सिद्धांत के अनुसार अपराधी को पुणे अपराध करने से रोकना है इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपराधी को जेल में रखा जाता है पदच्युत किया जाता है या मृत्यु दंड दिया जाता है इसके मुख्य समर्थक होम्स तथा सामंड है सामंड अपने विचार के समर्थन में तर्क देते हुए कहते हैं कि हम सांपों को इसलिए मार डालते हैं कि वह संसार में ना रहे पर यदि रहते हैं तो काट खाए जाने का भय बना रहेगा इससे मुक्त रहने के लिए अच्छा यही होता है कि उन्हें रहने ही ना दिया जाए यही बात गंभीर अपराधियों के बारे में भी लागू होती है उन्हें प्राण देकर आगे अपराध करने से रोक दिया जाता है प्राचीन काल में इसलिए अपराधियों का अंग भंग का कर दिया जाता था योनि संबंधी अपराध करने वालों को नपुंसक बना दिया जाता था
आलोचना (Criticism) :- कान्ट के अनुसार यह सिद्धांत व्यक्ति को वस्तु के रूप में प्रयोग करता है उसे साधन माना गया है ना के उद्देश्य यह मानवता के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता इसके अलावा सभी अपराधियों को तो मृत्युदंड नहीं दिया जाता अपराधी जो कारावास में सजा भुगत कर बाहर आते हैं तो आदती अपराधी (Habitual Offender) उन्हें वही करने लगते हैं और उनके मन में दंड काव्य खत्म हो जाता है पैटन के अनुसार यह सिद्धांत अपराध की प्रवृत्ति में सुधार की ओर विशेष ध्यान नहीं देता
3.प्रतीकारात्मक सिद्धांत (Retributive Theory) :- यह सिद्धांत बदले की भावना पर आधारित है इस सिद्धांत के अनुसार अपराधी को उसके अपराध के अनुपात में ही दंडित किया जाना चाहिए दांत के बदले दांत आंख के बदले आंख तथा अंग के बदले रअंग का सिद्धांत लागू होता है उस व्यक्ति का हाथ काट लेना न्यायोचित होगा जिसने दूसरे का हाथ काटा हो अतः यह सिद्धांत जैसे को तैसा वाली कहावत पर आधारित है इस सिद्धांत के समर्थक कांड होम्स सामंड तथा डॉ इविंग हैं कांट का मत है कि बदला लेने से मानव भवनाओं को संतोष मिलता है यह भी कहा जाता है कि दोष और दंड मिलाकर निर्दोषता के बराबर होते हैं
आलोचना (Criticism) :- यह सिद्धांत का व्यवहारिक तथा अनुपयोगी है इस सिद्धांत में अपराधी के सुधार के लिए कोई स्थान नहीं है इसके मुख्य दोष हैं कि (i) जिस व्यक्ति का हाथ, पैर या नाक कट गई उसका बदला उसी रूप में लेने से कोई लाभ नहीं होता बदला लेकर उस अंग का स्थानापन्न नहीं किया जा सकता बेंथम ने से शेर के मुख से मधु टपकने के समान माना है, (ii) जो कपट या क्षति किसी व्यक्ति को हुए हैं उनके समान अनुपात में अपराधी को कष्ट देना संभव नहीं है, (iii) यदि यह सही है कि बदला लेने से आत्मसंतोष होता है तो हत्या के मामलों में इस प्रकार के आत्मसंतोष का कोई प्रश्न ही नहीं उठता वास्तव में अपराध की जाने की परिस्थितियां होती हैं| अतः हमें अपराध के कारणों का उन्मूलन करके अपराधों को रोकना चाहिए
4.सुधारात्मक सिद्धांत (Reformative Theory) :- वर्तमान युग में अपराधियों को दंडित करने की अपेक्षा उनके सुधार पर अधिक महत्व दिया जाता है सुधारात्मक सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी के चरित्र सुधार पर विशेष बल देना है अपराधी में यह भावना पैदा की जाती है कि अपराध एक करना एक सामाजिक बुराई है इहरिंग के अनुसार अपराध के तत्वों का पता लगाने तथा सामाजिक परिस्थितियों में दोष निवारण करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिए अच्छे न्याय के लिए यह आवश्यक है कि अपराधी की मनोवैज्ञानिक आर्थिक सांस्कृतिक कौटम्बिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करके उनके संदर्भ में ही सजा तथा सुधार के उपायों को लागू किया जाए| महात्मा गांधी के अनुसार अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं (Hate the sin not the sinner) | इसी में हम सब का कल्याण निहित है अपराध की जड़ को समाप्त करना हितकर होगा ना कि अपराधी को क्योंकि अपराधी का भी समाज के लिए कोई महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है केवल अपराध करने से वह अमानत नहीं बन जाता उसमें मानवीय गुण छुपे रहते हैं उनका विकास करना आवश्यक होता है भारतीय इतिहास में इसके उदाहरण महर्षि वाल्मीकि और अंगुलिमाल आदि हैं
यह सिद्धांत अपराधी को एक रोगी के रूप में देखता है जिस प्रकार चिकित्सा पद्धति में से रोगों में सुधार लाया जाता है और उसे स्वस्थ कर दिया जाता है उसी प्रकार अपराधी में भी वैज्ञानिक सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक उपायों में सुधार लाया जाना चाहिए जिस व्यक्ति ने जिस प्रकार का जिन परिस्थितियों में अपराध किया है उसी अनुपात में तथा उसे आधार पर दंड दिया जाना चाहिए डॉ विनोग्रेडाफ के अनुसार न्यायाधीश की स्थिति एक डॉक्टर के समान ही है उसको भी चिकित्सक की तरह बीमारी के कारणों की छानबीन करके रोग का उपचार करना चाहिए
आलोचना (Criticism) :- यह सिद्धांत अधिक उपयोगी है (i) क्योंकि यह अपराधियों का हृदय परिवर्तन करके अपराध के प्रति ग्लानि पैदा करता है (ii)यह किशोर तथा प्रथम अपराधियों के प्रति बहुत न्याय कार्य सिद्ध हुआ है यह किशोर अपराधियों को अन्य अपराधियों से अलग रखकर उन्हें दक्ष अपराधी बनने से रोकता है (iii) यह अपराधियों को व्यवसायिक शिक्षा देता है जिससे जब वे जेल से छूटते हैं तो अपना जीवन निर्वाह कर सकते है परंतु सामान्य के अनुसार इस सिद्धांत में 3 बुराइयां हैं- (i) अपराधियों को शारीरिक बौद्धिक तथा नैतिक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कार्यवाही को सुखद आवास गृह में बदलना होगा जिससे अपराधियों के हृदय से दंड का वह खत्म हो जाएगा (ii) आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों पर सुधार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और इस नीति से अपराध करना एक लाभदायक धंधा बन जाएगा
5.क्षतिपूर्ति का सिद्धांत(Theory of Compensation) :- इस सिद्धांत के अनुसार दंड का उद्देश्य न केवल अपराधों को रोकना चाहिए बल्कि जिसके प्रति अपराध किया जाता है और उसकी क्षतिपूर्ति करना भी होना चाहिए इस सिद्धांत के प्रतिपादकों का कहना है कि अपराधिकता का मुख्य कारण लोभ है यदि अपराध द्वारा कमाए गए लाभों से वापस लौटाने के लिए बाध्य किया जाए तो अपराध एकता का मुख्य स्रोत सूख जाएगा
आलोचना (Criticism) :- यद्यपि इस सिद्धांत में काफी सच्चाई है तथापि सभी अपराधों का उद्देश्य आर्थिक ही नहीं होता राज्य न्याय धर्म विवाह और यहां तक कि व्यक्ति के प्रति किए जाने वाले अपराधों का उद्देश्य हमेशा आर्थिक नहीं होता ऐसे मामलों में अपराधी आर्थिक उद्देश्य होने के बावजूद भी उसकी आर्थिक दशा खराब होने के कारण मुआवजा प्राप्त करने में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है इसके अलावा अमीरों के लिए अपराध एक पेशा बन गया था क्योंकि उन्हें अपराध के बदले क्षतिपूर्ति देना आसान था
निष्कर्ष Conclusion) :- सामंड का मत है कि न्याय प्रशासन की दृष्टि से न तो केवल सुधारात्मक पद्धति उपयुक्त है और ना ही निवारणात्मक पद्धति बल्कि इन दोनों का उचित समन्वय होना आवश्यक है भारतवर्ष के लिए दंड का कोई एक सिद्धांत उपयुक्त दंड सुधारात्मक और प्रतिशोध आत्मक पद्धति के समन्वय के आधार पर दिया जाना चाहिए दंड का स्वरूप अपराधी की व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए कुछ अपराधी सामान्य और अस्वस्थ प्रकृति के नहीं होते ऐसे अपराधियों के प्रति सुधारात्मक दंड व्यवस्था लागू करना बेकार है इसके विपरीत महिला किशोर या प्रथमत: अप- राधियों को कठोर दंड देना अनुचित है उन्हें सुधारात्मक दंड पध्दति से सुयोग्य नागरिक के रूप में पुनः स्थापित किया जाना चाहिए डॉक्टर सेथना ने भी यह निष्कर्ष निकाला है कि प्रतिकर देने की बाध्यता अनुचित कमाई को ले लिया जाना ऊपर से दंड यह तीनों बातें से संबंधित है तो अपराधी पुन: अपराध करने के लिए प्रेरित नहीं होगा|

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