परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 5- Section 5 of Limitation Act 1963

 मियाद बढ़ाने के लिए कौन से कारण पर्याप्त माने जाते हैं और कौन से नहीं ? दृष्टांत दीजिए|(Give illustration to explain what is and what is not Sufficient Cause for the purpise of extention of period of limitation)  

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पुनरावेदन की मियाद बढ़ाने के लिए कौन कौन से कारण पर्याप्त है और कौन कौन से कारण नहीं ?(What are and what are not sufficient cause for the purpose of extention of limitation for an appeal ?)

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विहित मर्यादा काल की संगणना करते समय किन परिस्थितियोंवश कालावधि अपवर्जित की जा सकती है| इन परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए|(There are some situations where certain period can be excluded for calculating the period of limitation. Describe them.)


भारतीय मियाद अधिनियम 1963 की धारा 3 यह सामान्य नियम प्रतिपादित करती है कि निर्धारित अवधि के बाद दायर किए गए बाद अपील और आवेदन खारिज कर दिए जाएंगे धारा 5 इस सामान्य नियम का एक अपवाद पेश करती है जिसके अनुसार यदि अपीलकर्ता  या आवेदक किसी भी प्रकार से न्यायालय को संतुष्ट कर दें कि मियाद अवधि के अंतर्गत अपील या आवेदन प्रस्तुत न करने का उसके पास पर्याप्त कारण था तो समय अवधि की समाप्ति के बाद भी अपील या आवेदन स्वीकार कर लिया जाएगा किंतु यह छूट अधिकार रूप में प्राप्त नहीं की जा सकती बल्कि यह न्यायालय की रियायत पर निर्भर करती है


परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 5- Section 5 of Limitation Act 1963
परिसीमा अधिनियम 1963 की धारा 5- Section 5 of Limitation Act 1963



धारा 5 की प्रयोग्यता (Applicability of section 5) :- धारा 5 निम्नलिखित मामलों में लागू होती है

(i) अपील

(ii) आवेदन जो C.P.C. के आदेश के अलावा हैं


पर्याप्त कारण (Sifficient Cause) :- धारा 5 में प्रयुक्त शब्दावली पर्याप्त कारण को मियाद अधिनियम में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है पर्याप्त कारण से तात्पर्य देरी के ऐसे कारण से है जो धारा 5 का लाभ लेने वाले पक्ष कार के नियंत्रण से बाहर है देरी का ऐसा कारण जो पक्षकार के द्वारा उचित सावधानी और ध्यान देकर दूर किया जा सकता था पर्याप्त कारण नहीं कहा जा सकता| कोई कारण पर्याप्त कारण है या नहीं यह जानने के लिए मुख्य कसौटी यह है कि क्या वह उचित सावधानी और ध्यान द्वारा दूर किया जा सकता था


आशुतोष चंद्र बनाम जे. एस. सील A.I.R. 1954 Cal 238 में कहा गया के पर्याप्त कारण से तात्पर्य से कारण से है जो पक्ष कार के नियंत्रण से परे है स्मरणीय है कि क्या पक्ष करके सावधान रहने से यह समस्या दूर हो सकती थी और क्या कारण समाप्त हो सकता था सावधानी जो पक्षों द्वारा हुई है वह इसके लिए पर्याप्त कारण नहीं है| कमीरूद्दीन बनाम विष्णु प्रिया A.I.R 1889 Cal 240 में कहा गया है कि न्यायालय को सावधानी का बहुत ऊंचा स्तर नहीं लेना चाहिए और यदि उस अवस्था में देर उपयुक्त है तो धारा 5 का लाभ दे देना चाहिए


पर्यावरण के उदाहरण (Examples of Sufficient Cause) :- पर्याप्त कारण का सर्वप्रथम उदाहरण धारा 5 की व्याख्या में वर्णित है जिसके अनुसार यह तथ्य की अपीलकर्त्ता या आवेदक किसी आदेश प्रक्रिया या उच्च न्यायालय के निर्णय की मियाद की गणना या हिसाब लगाने से गुमराह हो गया था इस अर्थ में अर्थात् अवधि के विस्तार के लिए पर्यावरण माना जाएगा इसके अलावा पर्याप्त कारण के अन्य उदाहरण निम्न प्रकार हैं


(i) बीमारी (Illness) :- गौरीशंकर बनाम काशी नाथ A.I.R. 1943 All 367 में कहा गया कि यदि अपीलकर्ता या प्रार्थी ऐसी बीमारी से पीड़ित है जैसे तेज बुखार जिसके कारण में पूर्ण रूप से बिस्तर पर पड़ा रहा हो और फलस्वरुप रिव्यू आवेदन पेश करने में 4 दिन की देरी हो गई हो तो यह देरी को माफ करने का उचित कारण है किंतु साधारण बीमारी में इस धारा का लाभ नहीं मिलेगा


(ii) गलत वैधानिक सलाह (Mistaken legal advice) :- राजेंद्र बहादुर बनाम राजेश्वर बाली A.I.R. 1937 P.C. 276 में यह निर्णय लिया गया कि कपट या गलत कानूनी सलाह जो किसी वकील ने मोदी को दी है इस धारा के अंतर्गत मियाद के विस्तार के लिए पर्याप्त कारण है|

              अत: यदि वकील की ओर से बिना किसी कपट और असावधानी के कोई गलती हो जाती है तो इसका लाभ अवधि का विस्तार करने हेतु प्राप्त किया जा सकता है किंतु इसके विपरीत मिट्ठू लाल बनाम जमुना में कहा गया है कि कोई अपीलकर्ता इस बात का लाभ उस अवस्था में प्राप्त करने का हकदार नहीं है यदि वकील की सलाह ईमानदारी पूर्ण होते हुए भी घोर असावधानी से दी गई है और अपीलकर्ता उस आधार पर काम करता है|सर मुख सिंह बनाम चरण सिंह A.I.R. 1960 पंजाब 582 में कहा गया कि जब वकील ने पूरी सावधानी और सद्भावना से सलाह दी हो और उस सलाह के फलस्वरूप बाद अपील आवेदन की मियाद खत्म हो गई हो तो धारा 5 का लाभ दिया जा सकता है किंतु यह गलती ऐसी होनी चाहिए जो होशियार वकील से भी संभव हो

3. वकील के मुंशी की गलती (Mistake of Advocate's Clerk) :- यदि वकील के मुंशी द्वारा अवधि की गणना करने में गलती हो गई है तथा इस गलती के विषय में न्यायालय में यह सिद्ध कर दिया गया है कि इसमें किसी प्रकार का कोई कपट नहीं था तो मुंशी की ऐसी गलती के कारण अवधि का विस्तार किया जा सकता है


4. विधि का गलत अर्थ लगाना :- दादी अली बनाम अनीर बक्स 1950 R.D. 142 में कहा गया की विधि की भूल क्षमा योग्य नहीं है किंतु यदि भूल ही मांधारी पूर्वक किसी सक्षम एडवोकेट की गलत राय के कारण हुई है तो वह समय विस्तार का पर्याप्त कारण होगा


5. गरीबी नाबालगी तथा पर्दा (Poverty, Minority and Purda) :- अपीलकर्ता या निवेदक को गरीबी, नाबालगी या पर्दानशीन होना कोई भी बात मत विस्तार के लिए उचित कारण नहीं है नाबालिगों के लिए उनकी अल्पायु का होना कोई उचित बचाव नहीं है यदि उनके संरक्षक असावधानीपूर्वक कार्य करते हैं किसी स्त्री का पर्दानशीन होना भी उचित कारण के अंतर्गत नहीं आएगा


6. विरोध या कारावास (Detention and Imprisionment) :- यदि किसी व्यक्ति को किसी अपराध करने के जुर्म में निरूद्ध या कारावास में बंद कर दिया जाता है तो जितने दिन कारण वह कारावास में रहा हो उतना समय अवधि के विस्तार के लिए उचित कारण माना जाएगा


7. दोषपूर्ण वकालतनामा (Defective Vakalat nama) :- यदि किसी एडवोकेट द्वारा सद्भावनापूर्वक किसी वकालतनामा के भरने में गलती हो जाती है तो ऐसी गलती समय विस्तार का आधार बन सकती है ऐसी गलतियों में वकालतनामा पर एडवोकेट का नाम स्पष्ट रुप से लिखा जाना चाहिए तथा एडवोकेट द्वारा ही यह न लिखना कि वकालतनामा स्वीकार है आदि शामिल है यदि वकालतनामा भरने में से त्रुटि निष्कपट और सदभावनापूर्वक हुई है तो ऐसे भूलो और गलतियों के फलस्वरूप हुई देरी के कारण मियाद का विस्तार हो सकता है


निष्कर्ष (Conclusion) :- संक्षेप में वर्णन के आधार पर हम कह सकते हैं कि उक्त वर्णित उदाहरण पर्यावरण के अंतर्गत शामिल है तथा उनके आधार पर वाद दायर करने पर समय को बढ़ाया जा सकता है

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